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अपना सपना Money Money !

जय.. जय…

अर्थव्यवस्था सभी के जीवन निर्वाह हेतु महत्वपूर्ण घटक है, वह चाहे एक व्यक्ति हो या विश्वव्यापी संस्था। 
Economy is an important component for the sustenance of all, be it an individual or global organization.

जिसे भी ‘प्रकृति व्यवस्था अंतर्गत आपूर्ति की अटूट श्रृंखला प्रणाली’ (Unbreakable Chain of Supply System in Nature) का यथार्थ बोध हो उसे  धन कमाने के संदर्भ में कभी भी व्यर्थ चिंता, व्यग्रता या क्लेश हो ही नहीं सकता ! आज भी बहुत से ऐसे व्यक्ति है जो इस स्थिति को उपलब्ध है।

इस सिद्धांत के समर्थन में संत मलूक दास के जीवन में परिवर्तन लाने वाली घटना का प्रसंग हम ‘इष्ट जीवन अभिलाषी’ के लिए प्रेरणादायक है, जो यहाँ प्रस्तुत है :

अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काम,
दास मलूका कह गए, सब के दाता राम !

बात ज्यादा पुरानी भी नहीं है, सत्रहवीं सदी की ही है। और जैसे बहुत सी प्रसिद्घ बातों के साथ होता है वैसे ही इस बात के भी अलग अलग विवरण पाए जाते हैं, लेकिन मुलभुत सार तो सब में सामान ही है। 

इलाहाबाद जिले में मलूकदास नाम के एक सेठ थे। उनके बंगले के पास ही एक मंदिर था। मंदिर में वार त्यौहार अवसर पर भजन कीर्तन होते रहते थे। सेठ मलूकदास को इससे काफी परेशानी होती थी। कभी कभी भजन कीर्तन देर रात तक भी चलते थे जिससे सेठ मलूकदास की नींद भी खराब होती थी। 

इस बात से परेशान सेठ अक्सर मंदिर के पुजारी को शिकायत करते रहते थे, “अरे! क्या जागरण-कीर्तन करते हो? हमारी नींद हराम कर दी है।”

पुजारी मलूकदास को समझाते हुए कहते, “प्रभु हमारा लालन पालन करते हैं, वही हमारे अन्नदाता है हम उनके गुण-गान गाकर अपने आप को कृतार्थ महसूस करतें हैं।”

इस बात पर मलूकदास यह तर्क करते की, “कैसी बात करते हो, क्या भगवान हमें खिलाने आता है ? अरे अच्छी नींद के बाद व्यक्ति काम करने के लिए तैयार हो पाता है, फिर कमाता है तब खाता है।’’

इसी तरह मलूकदास तर्क वितर्क करके पुजारी को चुप कर देते। 

एक दिन मंदिर में कोई सन्यासी पधारे थे और उनका प्रवचन चल रहा था। संयोग से उस दिन मलूकदास भी भगवद कथा में पहुंचे। उस समय वह संत प्रभु की महिमा का वर्णन कर रहे थे उनके ये बोल थे की, “ईश्वर जिसे कोई राम कहता है तो कोई अल्लाह, कोई माता-रानी कहता है तो कोई तीर्थंकर, कोई बुद्ध कहता है तो कोई शंकर, कोई जीसस कहता है तो कोई ओंकार। आप चाहे उसे अलग अलग रूप में पहचानतें  हो… वो तो वही है सर्वेसर्वा, सर्वसमर्थ सबका पालनहारा ! वह जगन्नाथ ही सकल संसार का पालन पोषण कर रहे है; वह भूखों को अन्न, नंगों को वस्त्र और आश्रयहीनों को आश्रय देते हैं।” मलूकदास ने भी साधु की यह बात सुनी पर वह सहमत नहीं हुए। 

सेठ मलूकदास ने अपना विरोध जताते हुए कहा ‘‘क्या भगवान खिलाता है? अरे हम कमाते हैं तब खाते हैं।’’ 

संत ने कहा “सेठजी ! खिलाता तो वह खिलाने वाला ही है। निमित्त होता है तुम्हारा कमाना और पत्नी का रोटी बनाना। बाकी सबको खिलानेवाला, सब का पालनहार तो वह जगन्नियंता ही है।” 

आदत अनुसार सेठ ने तर्क किया “क्षमा करे महात्मन ! यह तो बाबा आदम के जमाने की बातें लगती है। यदि मैं कोई काम न करूं, तब भी क्या भगवान मुझे भोजन देंगे ?”

साधु ने पूरे विश्वास के साथ कहा “अवश्य देंगे।”

सन्यासी की वाणी एवं मुख के भाव से भगवान के प्रति उनकी दृढ़ श्रद्धा एवं निष्ठा उजागर हो रहे थे।

उनकी दृढता से मलूकदास के मन में एक और प्रश्न उभरा तो पूछ बैठे, “यदि मैं घनघोर जंगल में अकेला बैठ जाऊं, तब भी ?”

संत ने दृढ़ता के साथ कहा, “तब भी परम सत्ता द्वारा आपके लिए भोजन का प्रबंध हो ही जाएगा !”

साधु के वचनों में अनुभव का स्पष्ट आधार प्रतीत हो रहा था।
पर यह बात मलूकदास को अविश्वसनीय लगी। सेठ मलूकदास फिर तर्क करते हुए बोले, “में कैसे मान लूं की ऐसा हो सकता है ?”

तब सन्यासी ने कहा, “स्वानुभव ही सबसे सटीक प्रमाण माना जाता है ! आप का समाधान तब ही संभव है जब आप खुद इस स्थिति को अपनाकर देखें”

सेठ मलूकदास ने तुरंत ही तय किया और वो जंगल पहुंच गए तथा वहां एक घने पेड़ के ऊपर चढ़कर बैठ गए।

चारों तरफ अंधेरा फैल गया, मगर न मलूकदास को भोजन मिला, न वह पेड़ से ही उतरे। वो सारी रात पेड़ पर ही बैठे रहे।

अगले दिन दूसरे प्रहर घोर सन्नाटे में मलूकदास को घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनाई पड़ी। वह एकदम सतर्क हो  गए। थोड़ी देर में कुछ राजकीय अधिकारी उधर आते हुए दिखे। वे सब उसी पेड़ के नीचे घोड़ों से उतर पड़े। उन्होंने भोजन का मन बनाया। उसी समय जब उन लोगो ने भोजन के डिब्बे निकाल ही थे कि शेर की जबर्दस्त दहाड़ सुनाई पड़ी। दहाड़ सुनते ही उनके घोड़े बिदककर भाग गए। अधिकारियों ने पहले तो स्तब्ध होकर एक-दूसरे को देखा, फिर भोजन छोड़ कर वे भी भाग गए। मलूकदास पेड़ से ये सब देख रहे थे। वह शेर की प्रतीक्षा करने लगे। मगर दहाड़ता हुआ शेर दूसरी तरफ चला गया।

मलूकदास को लगा, भगवान ने उसकी सुन ली है वरना इस घनघोर जंगल में भोजन कैसे पहुँचता? मगर मलूकदास उतरकर भला स्वयं भोजन क्यों करने लगे ! वह तो विश्वंभर को परख रहे थे।

तीसरे प्रहर में डाकुओं का एक बड़ा दल उधर से गुजरा। पेड़ के नीचे चमकदार चांदी के बर्तनों में विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के रूप में पड़े भोजन को देख कर डाकू ठिठक गए।

डाकुओं के सरदार ने कहा, “उस ऊपर वाले की लीला देखो, हम लोग भूखे हैं और कहीं भोजन मिल जाए ऐसी प्रार्थना कर रहे थे ! तो लो इस निर्जन वन में सुंदर डिब्बों में भोजन भेज दिया। इसे खा लिया जाए तो आगे बढ़ें।”

मलूकदास को हैरानी हुई कि डाकू भी ईश्वर पर इतनी आस्था रखते हैं कि वह भोजन भेजेंगे। वह यह सब सोच ही रहे थे कि उन्हें डाकुओं की बात में कुछ शंका सुनाई पड़ी।

डाकू स्वभावतः शंकाशील होते हैं। एक साथी ने सावधान किया, “सरदार, इस सुनसान जंगल में इतने सजे-धजे तरीके से सुंदर बर्तनों में भोजन का मिलना मुझे तो रहस्यमय लग रहा है। कहीं इसमें विष न हो ?”

यह सुनकर सरदार बोला, “तब तो भोजन लाने वाला आस पास ही कहीं छिपा होगा। पहले उसे ढूंढा जाए।”

सरदार के आदेश पर डाकू इधर-उधर तलाशने लगे। तभी एक डाकू की नजर मलूकदास पर पड़ी। उसने सरदार को बताया।

सरदार ने सिर उठाकर मलूकदास को देखा तो उसकी आंखें अंगारों की तरह लाल हो गईं। उसने कहा, “दुष्ट ! भोजन में विष मिलाकर तू ऊपर बैठा है ! चल नीचे उतर।”

सरदार की कड़कती आवाज सुनकर मलूकदास डर गए मगर उतरे नहीं। वहीं से बोले, “क्यों मुझपर दोष मढ़ते हो ? भोजन में विष नहीं है।”

सरदार ने अपने साथिओं को आदेश दिया, “पहले पेड़ पर चढ़कर इसे भोजन कराओ। झूठ-सच का पता अभी चल जाता है।”

आनन-फानन में तीन-चार डाकू भोजन के डिब्बों को ले कर पेड़ पर चढ़ गए और छुरा दिखा कर मलूकदास को खाने के लिए विवश कर दिया। मलूकदास को उस घने जंगल में पेड़ पर ही भरपेट स्वादिष्ट भोजन करने मिला। फिर नीचे उतरकर उन्होनें डाकुओं को पूरा किस्सा सुनाया। डाकुओं ने उन्हें छोड़ दिया।

“वह स्वयं भोजन से भाग रहे थे लेकिन प्रभु की माया ऐसी रही कि उन्हें बल पूर्वक भोजन करा दिया। इस घटना के बाद मलूकदास ईश्वर के पक्के भक्त हो गए।”

गांव लौटकर मलूकदास ने सर्वप्रथम यह दोहा लिखा|

‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम॥’

इस पूरी कहानी में जो सार उजागर होता है वह यह है की :

  • ‘जीवन यापन’ ऐसी व्यापक व्यवस्था है जो अपने आप में परिपूर्ण है जिसे कुदरत या प्रकृति आदि नामों से जाना जाता है।  

  • इस कुदरत का प्रबंधन (Management) अत्यंत रहस्यमय सत्ता (Extremely Mysterious Power / Authority) द्वारा संचालित हो रहा है। 

  • प्रकृति में घटित होनेवाली घटनाओं का आयोजन अकल्पनीय संयोग (Unbelievable Coincidence) से घटित होता है। अतः स्वाभाविक है की सामान्य मानवीय समझ एवं अनुमान (Understanding and Inference) से इस व्यवस्था का पूरा पता नहीं चल पाता। 

  • हमारा हित इसी में है की हम निष्ठा एवं श्रद्धा पूर्वक इस प्रकृति व्यवस्था अंतर्गत अपने एवं सबके कल्याण हेतु अपनी योग्यता (Eligibility) एवं क्षमता (Capability) के अनुसार प्रयत्न करते रहें। 

  • हमारे ‘जीवन यापन’ निमित्त परम सत्ता द्वारा सभी प्रकार से हमारा भरण-पोषण तथा लालन-पालन होना ही तो  है।

श्रीमद् भगवद् गीता (श्रीमद्भगवद्गीता) के इन कथनों || कर्मण्येवाधिकारस्ते || एवं || योगक्षेमं वहाम्यहम् || द्वारा भी तो यही संदेश पाया जा रहा है !

‘इष्ट जीवन मंच’ के समर्पित सदस्यों का अपना यह अनुभव है की धन, संपत्ति, वैभव आदि तो कल्याण की उपलब्धि निमित्त किए जाने वाले प्रयत्नों का प्रतिफल / उपफल (By-products) मात्र है…

अपौरुषेय वेद अनुसार यह ‘इष्ट जीवन मंच’ भी आविर्भूत संकल्पना है, अतः यह (इष्ट जीवन मंच) भी प्रकृति पूरक प्रवृत्ति ही है !

आप ‘इष्ट जीवनअभिलाषी’ भी यहाँ पर रिद्धि, सिद्धि एवं समृद्धि से भरपूर जीवन जिएं यह ही मंगल भावना।

जय.. जय…

एक विशेष घोषणा :

हम सब ‘इष्ट जीवन संचार’ के प्रसारण का लाभ ब्लॉग पेज, यु ट्यूब, फेसबुक के माध्यम से तो पा ही रहें है, साथ ही साथ अब से व्हॉट्सएप पर भी ‘इष्ट जीवन’ लक्षित हितावह एवं लाभप्रद माहितिओं को जन सुलभ कराया जाएगा। 

इस हेतु ‘ISHT LIFE’ इस नाम से एक व्हॉट्सएप गृप बनाया जा रहा है।

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मलूकदास की कहानी

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